इंदौर। भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से जुड़ा संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। मंगलवार को एक और मरीज की मौत हो गई, जिसके बाद इस मामले में मौतों की संख्या बढ़कर 29 हो चुकी है। राहत की बात यह है कि अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या घटकर छह रह गई है। इनमें से तीन मरीज आईसीयू में हैं और एक वेंटिलेटर पर है।
इसी गंभीर मामले को लेकर मंगलवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में करीब ढाई घंटे तक सुनवाई हुई। सुनवाई की शुरुआत में मुख्य सचिव अनुराग जैन करीब दस मिनट तक वर्चुअल रूप से उपस्थित रहे। सरकार की ओर से पेश रिपोर्ट में 23 मौतों का जिक्र किया गया, जिनमें से 16 मौतों को दूषित पानी से जोड़कर देखा गया है। चार मामलों में स्थिति स्पष्ट नहीं बताई गई, जबकि तीन मौतों को जलजनित बीमारी से अलग माना गया है।
कोर्ट ने मामले को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति बताते हुए सख्त रुख अपनाया। न्यायालय ने कहा कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि सुरक्षित पानी की आपूर्ति, इलाज और जांच से जुड़े निर्देशों का जमीनी स्तर पर पूरी तरह पालन नहीं हुआ है। मौतों के आंकड़ों को लेकर भी सरकार और याचिकाकर्ताओं के दावों में बड़ा अंतर सामने आया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय जांच आयोग गठित करने के आदेश दिए हैं। यह आयोग जल प्रदूषण के कारणों, वास्तविक मौतों की संख्या, बीमारियों की प्रकृति, चिकित्सा व्यवस्था की स्थिति, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और पीड़ितों को मुआवजे से जुड़े बिंदुओं पर रिपोर्ट देगा। कोर्ट ने आयोग से चार सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट पेश करने को कहा है। अगली सुनवाई 5 मार्च 2026 को होगी।
आयोग को सिविल कोर्ट के समान अधिकार दिए गए हैं। वह अधिकारियों और गवाहों को तलब कर सकेगा, दस्तावेज मंगा सकेगा, पानी की गुणवत्ता की जांच करा सकेगा और मौके का निरीक्षण भी कर सकेगा। राज्य सरकार को आयोग के लिए आवश्यक स्टाफ, कार्यालय और संसाधन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि भागीरथपुरा क्षेत्र के करीब 30 प्रतिशत हिस्से में पानी की सप्लाई फिर से शुरू कर दी गई है, जो लगभग साढ़े नौ किलोमीटर क्षेत्र में फैली है। इस पर न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की पीठ ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। कोर्ट ने रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए ‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द पर भी आपत्ति जताई और पूछा कि क्या यह कोई मान्य मेडिकल टर्म है या इसे मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया गया है।
कोर्ट ने यह भी पाया कि रिपोर्ट में मौतों के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं और उसमें ठोस तर्क व सहायक दस्तावेजों का अभाव है। न्यायालय ने निर्देश दिए कि अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय दस्तावेज पेश किए जाएं। अंतरिम राहत को लेकर भी कोर्ट ने चिंता जताई और पूछा कि समिति अपने सुझावों का निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित करेगी।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने रिपोर्ट को अस्पष्ट बताते हुए उसे केवल ‘आई-वॉश’ करार दिया। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला ने नगर निगम को निर्देश दिए कि वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा सुझाए गए परीक्षणों पर गंभीरता से विचार किया जाए और कोर्ट की सभी चिंताओं का स्पष्ट जवाब दिया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने न्यायालय परिसर में भी स्वच्छता और सुरक्षित जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजय बगड़िया ने तर्क दिया कि डेथ ऑडिट रिपोर्ट में जिन 16 मौतों को दूषित पानी से जोड़ा गया है, उनके बारे में रिमार्क कॉलम में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इससे रिपोर्ट भ्रामक बनती है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि नगर निगम केवल आठ मानकों पर पानी की जांच कैसे कर रहा है, जबकि पहले 34 मानकों पर जांच में पानी को फिकल कंटामिनेटेड पाया गया था।
नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि जिन 16 बोरिंग से गंदा पानी आ रहा था, उन्हें बंद कर दिया गया है। इस पर याचिकाकर्ता ने मांग की कि इन बोरिंग को पूरी तरह सील किया जाए। निगम की ओर से कहा गया कि बोरवेल बंद होने पर अन्य जरूरतों के लिए पानी की समस्या होगी और इसके लिए लोगों को पेम्पलेट और पोस्टर के जरिए जागरूक किया जा रहा है। इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि इलाके के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, ऐसे माध्यम उनके लिए कारगर नहीं होंगे।
मुआवजे को लेकर भी सवाल उठे। याचिकाकर्ता ने बताया कि मृतकों के परिजनों को जो दो-दो लाख रुपये दिए गए हैं, वह रेड क्रॉस सोसायटी की ओर से हैं, जबकि शासन की तरफ से कोई मुआवजा नहीं मिला। उन्होंने तर्क दिया कि अन्य हादसों में शासन चार-चार लाख रुपये देता है, लेकिन दूषित पानी से जान गंवाने वालों के साथ अलग रवैया अपनाया जा रहा है।
इधर, मंगलवार को भागीरथपुरा में 63 वर्षीय खूबचंद की मौत हो गई। वह पिछले 15 दिनों से उल्टी-दस्त से पीड़ित थे। परिजनों के अनुसार, उन्हें स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दवाइयां दी गई थीं। मंगलवार शाम उनकी तबीयत फिर बिगड़ी और घर पर ही उनकी मौत हो गई। बेटे राहुल का कहना है कि उनके पिता पूरी तरह स्वस्थ थे और दूषित पानी के कारण बीमार पड़ने के बाद ही उनकी जान गई। इलाके में फिलहाल टैंकरों के जरिए पानी की सप्लाई की जा रही है, लेकिन लोगों में अब भी डर और आक्रोश बना हुआ है।




