गुरुग्राम। दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम (डीएचबीवीएन) को अपने ही एक प्रोजेक्ट में लापरवाही के चलते करीब 71.68 लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा। बिजली निगम ने भुगतान भी तब किया जब अदालत में बिजली निगम का बैंक खाता अटैच किया गया। खाता अटैच होने पर बिजली निगम की किरकिरी भी हुई। टेंडर लेने वाली कंपनी का भुगतान होने के बाद अतिरिक्त एवं जिला सत्र न्यायाधीश महावीर सिंह की अदालत ने केस को खारिज करने का निर्णय दिया। “म्हारा गांव-जगमग गांव” योजना के तहत 2017 में मानेसर सबडिवीजन के गांवों में बिजली ढांचे को दुरुस्त करने के लिए करीब 99.63 लाख रुपये का टेंडर जारी किया गया था। टेंडर खुशी इलेक्ट्रिकल्स को दिया गया था। जिसने निर्धारित समय में काम पूरा कर दिया। इसके बावजूद निगम के अधिकारियों द्वारा बिलों का भुगतान समय पर नहीं किया गया। बिजली निगम के भुगतान रोकने वाले अधिकारी ने उस समय प्रोजेक्ट में लगाए गए सामान को सब-स्टैंडर्ड बताया था। भुगतान रुकने के बाद विवाद बढ़ता गया और मामला अदालत तक पहुंच गया। खुशी इलेक्ट्रिकल्स ने कार्य पूरा करने के बाद लगभग 99.63 लाख रुपये का बिल निगम के मानेसर सबडिवीजन में जमा किया था। जिसे तकनीकी आपत्तियों के आधार पर रोक दिया गया। कंपनी ने अपने अधिवक्ता शिवदयाल पाहुजा के माध्यम से पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। बाद में यह मामला मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) में गया। जहां कंपनी के पक्ष में निर्णय हुआ। इसके बाद भी निगम ने भुगतान नहीं किया। कंपनी ने अधिवक्ता शिवदयाल पाहुजा के माध्यम से न्यायालय में वसूली के लिए एग्जीक्यूशन याचिका दायर की। मामले की सुनवाई एक्सक्लूसिव कमर्शियल कोर्ट में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह-प्रेसाइडिंग जज महावीर सिंह की अदालत में हुई। डिक्री होल्डर की ओर से अधिवक्ता गौरव सिंह और जजमेंट डेब्टर (डीएचबीवीएन) की ओर से अधिवक्ता विवेक वर्मा उपस्थित रहे। अदालत के आदेश पर सेक्टर-14 स्थित एचडीएफसी बैंक से बिजली निगम के खाते से 71.68 लाख रुपये की राशि कंपनी के खाते में ट्रांसफर की गई। बैंक प्रबंधक ने भुगतान की पुष्टि न्यायालय में की। डिक्री होल्डर के अधिवक्ता गौरव सिंह ने अदालत को बताया कि पूरी राशि प्राप्त हो चुकी है। अब कोई बकाया नहीं है। इसलिए एग्जीक्यूशन याचिका को पूर्ण संतुष्टि के आधार पर वापस लिया जाता है। अदालत ने भुगतान की पुष्टि के बाद याचिका को पूरी तरह संतुष्ट मानते हुए खारिज कर दिया। बिजली निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि कई बार छोटी चूक के बड़े नुकसान झेलने पड़ते हैं। समय पर भुगतान न करने पर उन्हें न केवल मूल राशि बल्कि ब्याज और कानूनी खर्च भी चुकाना पड़ता है। अदालत के आदेश की अवहेलना करने पर बैंक खातों की अटैचमेंट जैसी कठोर कार्रवाई भी झेलनी पड़ती है। जैसा कि इस मामले में देखने को मिला।
अधिकारी की लापरवाही से बिजली निगम को 71 लाख की चपत




