नई दिल्ली। पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि अदालत में जूता फेंकने की कोशिश का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने उसी समय आरोपी को माफ कर दिया था। एक इंटरव्यू में उन्होंने साफ किया कि उन्हें हिंदू-विरोधी बताना पूरी तरह गलत है। उनके अनुसार यह प्रतिक्रिया उनकी परवरिश और परिवार से मिले संस्कारों का असर है। उन्होंने कहा कि सजा देने से ज्यादा महत्व माफ करने में है।
गवई ने बताया कि अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने कानून के सिद्धांतों और सेक्युलर मूल्यों को प्राथमिकता दी। उनका कहना है कि वे हर धर्म का सम्मान करते हैं और उनकी अंतरात्मा बिल्कुल स्पष्ट है।
गवई की बातचीत के मुख्य बिंदु
- भारत की अदालतें पूरी तरह स्वतंत्र हैं और उन पर सरकार का दबाव होने की बातें तथ्यहीन हैं।
- ट्रिब्यूनल के कुछ नियम इसलिए हटाए गए क्योंकि वे न्यायिक स्वतंत्रता के खिलाफ थे।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की नींव है और कोई भी कार्यकारी संस्था इसका स्थान नहीं ले सकती।
- उनके कार्यकाल में किसी अधिकारी ने नियुक्तियों या ट्रांसफर पर हस्तक्षेप की कोशिश नहीं की।
- अगर कोई गवर्नर किसी बिल पर कार्रवाई लंबित रखता है तो कोर्ट सीमित दायरे में उसकी समीक्षा कर सकती है, लेकिन वे विधायिका का काम नहीं कर सकते।
- उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट के बाद वे कोई सरकारी पद स्वीकार नहीं करेंगे, न गवर्नर बनेंगे और न राज्यसभा का नामांकन लेंगे।
पूर्व CJI गवई का कार्यकाल 23 नवंबर को समाप्त हुआ, जिसके बाद 24 नवंबर को जस्टिस सूर्यकांत ने देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल फरवरी 2027 तक रहेगा।
जूता फेंकने की घटना का संदर्भ
6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान एक वकील ने गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की थी। वह 16 सितंबर को मध्य प्रदेश में टूटी हुई विष्णु प्रतिमा के मामले पर हुई टिप्पणी को लेकर नाराज था। उस वकील को मौके पर हिरासत में लिया गया और सुप्रीम कोर्ट कैंपस में तीन घंटे पूछताछ के बाद छोड़ा गया क्योंकि कोर्ट प्रशासन ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने आरोपी वकील को निलंबित कर दिया था, जबकि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने उसी दिन उसका लाइसेंस रद्द कर दिया।




