नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है कि किसी भी व्यक्ति को सिर्फ शारीरिक अक्षमता के कारण न्यायिक सेवा में नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने मध्य प्रदेश के एक नेत्रहीन उम्मीदवार की मां द्वारा न्यायिक सेवाओं में ऐसे उम्मीदवारों को कुछ राज्यों द्वारा आरक्षण देने से इनकार करने के खिलाफ दायर एक स्वप्रेरणा याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। इसने स्वप्रेरणा मामले सहित छह याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। मध्य प्रदेश के एक नेत्रहीन उम्मीदवार की मां ने पिछले साल मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा (भर्ती और सेवा की शर्तें) नियमों के उस प्रावधान पर सवाल उठाया था, जिसके तहत राज्य न्यायिक सेवाओं में दृष्टिबाधित उम्मीदवारों की नियुक्ति पर रोक लगाई गई थी। पत्र मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पत्र को स्वप्रेरणा याचिका में बदल दिया और इस पर खुद सुनवाई करने का फैसला किया। फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि न्यायिक सेवा नियुक्तियों में शारीरिक अक्षमता के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। राज्य को ऐसे व्यक्तियों के लिए समावेशी ढांचा सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए। किसी भी व्यक्ति को विकलांगता के आधार पर दूर नहीं रखा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति महादेवन ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा, “किसी भी व्यक्ति को उसकी विकलांगता के कारण न्यायिक सेवा में नियुक्ति के लिए विचार से वंचित नहीं किया जाएगा।”
दृष्टिबाधित उम्मीदवारों को न्यायिक नियुक्तियों से वंचित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट




